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Lekhankan

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  1. 1. लेखांकन JYOTI SHARMA COURSE: B.ED ROLL NO: 9574086
  2. 2.  लेखा शास शेयर धारको और   प्रबंधको आिद के िलए िकसी    व्यावसाियक इकाई के बारे मे िवतीय जानकारी संप्रेिषत करने की  कला है।[1]  लेखांकन को 'व्यवसाय की भाषा' कहा गया है। िहन्दी मे  'एकाउन्टैन्सी' के समतुल्य 'लेखािविध' तथा 'लेखाकमर' शब्दो का भी प्रयोग िकया जाता है।  लेखाशास गिणितीय िवज्ञान की वह शाखा है जो   व्यवसाय मे  सफलता और िवफलता के कारणिो का पता लगाने मे उपयोगी है। लेखाशास के  िसद्धांत व्यावसियक इकाइयो पर व्यावहािरक कला  के तीन प्रभागो मे लागू होते है,  िजनके नाम है,  लेखांकन,  बही-खाता (बुक कीिपंग), तथा लेखा परीका  (ऑडिडिटिटंग)।
  3. 3. पिरचय  आधुिनक युग मे मनुष्य की आिथरक िक्रियाओं का रूप बहुत िवस्तृत तथा बहुमुखी हो गया है। अनेक प्रकार के व्यापार व उद्योग-धन्धो तथा व्यवसायो का जन्म हो रहा है। उद्योग-धन्धो व अन्य व्यावसाियक िक्रियाओं का उद्देश्य लाभाजरन होता है। व्यापारी या उद्योगपित के िलए यह आवश्यक होता है िक उसे व्यापार की सफलता व असफलता या लाभ-हािन व आिथरक िस्थित का ज्ञान होना चािहए। इसके िलए वह पुस्तपालन तथा लेखांकन (Book-keeping and Accountancy) की प्रिविधयो का व्यापक उपयोग करता है। लेखांकन-पुस्तके बनाकर व्यापािरक संस्थाओं को अपनी आिथरक िस्थित व लाभ-हािन की जानकारी प्राप्त होती है। यद्यिप पुस्तपालन व लेखाकमर व्यापारी के िलए अिनवायर नहीं होते लेिकन वे इसके िबना अपना कायर सफलतापूवरक संचािलत नहीं कर सकते और उन्हे अपनी व्यापािरक िक्रियाओं से होने वाले लाभ या हािन की जानकारी भी नहीं िमल पाती।  लेखे रखने की िक्रिया िकसी न िकसी रूप मे उस समय से िवद्यमान है जब से व्यवसाय का जन्म हुआ है। एक बहुत छोटा व्यापारी मिस्तष्क मे याद्दाश्त का सहारा लेकर लेखा रख सकता है, दूसरा उसे कागज पर िलिखत रूप प्रदान कर सकता है। व्यविस्थत रूप से लेखा रखा जाये या अव्यविस्थत रूप से, यह लेखांकन ही कहलायेगा। जैस व्यवसाय का आकार बढ़ता गया और व्यवसाय की प्रकृ ित जिटल होती गई लेखांकन व्यविस्थत रूप लेने लगा। इसमे तकर िवतकर , कारणि प्रभाव िवश्लेषणि के आधार पर प्रितपािदत ठोस िनयमो एवं िसद्धान्तो की नींव पड़ती गई एवं सामान्य लेखा-जोखा एक कालान्तर मे वृहत लेखाशास के रूप मे हमारे सामने आया।
  4. 4. लेखांकन का अथर एवं पिरभाषा आधुिनक व्यवसाय का आकार इतना िवस्तृत हो गया है िक इसमे सैकड़ो,  सहसो व अरबो व्यावसाियक लेनदेन होते रहते है। इन लेन देनो के ब्यौरे को याद रखकर व्यावसाियक उपक्रिम का संचालन करना असम्भव है। अतः इन लेनदेनो का क्रिमबद्ध अिभलेख (records)  रखे जाते है उनके क्रिमबद्ध ज्ञान व प्रयोग-कला को ही लेखाशास कहते है। लेखाशास के व्यावहािरक रूप को लेखांकन कह सकते है। अमेिरकन इन्स्ट्टीयूट ऑडफ सिटरफाइडिट पिब्लक अकाउन्टैन्ट्स (AICPA)  की लेखांकन शब्दावली, बुलेिटन के अनुसार ‘‘लेखांकन उन व्यवहारो और घटनाओं को, जो िक कम से कम अंशतः िवतीय प्रकृ ित के है, मुद्रा के रूप मे प्रभावपूणिर तरीके से िलखने, वगीकृ त करने तथा सारांश िनकालने एवं उनके पिरणिामो की व्याख्या करने की कला है।’’ इस पिरभाषा के अनुसार लेखांकन एक कला है, िवज्ञान नहीं। इस कला का उपयोग िवतीय प्रकृ ित के मुद्रा मे मापनीय व्यवहारो और घटनाओं के अिभलेखन, वगीकरणि, संकेपणि और िनवरचन के िलए िकया जाता है। िस्मथ एवं एशबनर ने उपयुरक पिरभाषा को कु छ सुधार के साथ प्रस्तुत िकया है। उनके अनुसार  ‘लेखांकन मुख्यतः िवतीय प्रकृ ित के व्यावसाियक लेनदेनो और घटनाओं के अिभलेखन तथा वगीकरणि का िवज्ञान है और उन लेनदेने और घटनाओं का महत्वपूणिर सारांश बनाने, िवश्लेषणि तथा व्याख्या करने और पिरणिामो को उन व्यिकयो को सम्प्रेिषत करने की कला है, िजन्हे िनणिरय लेने है।'  इस पिरभाषा के अनुसार लेखांकन िवज्ञान और कला दोनो ही है।
  5. 5.  लेखांकन कला और िवजान दोनो हैहै। कला के रूप में यह िवत्तीय पिरणाम जानने में सहायक होती है।  लेखांकन एक कला और िवजान दोनो इसमें अभिभिलिलिखत तथा वगीकृत लेन- देनो और घटनाओं का सारांश तैयार िकया जाता है। उन्हें िवश्लेिषित िकया जाता है तथा उनका िनवर्वचन िकया जाता है। िवत्तीय समंको का िवश्लेषिण एवं िनवर्वचन लेखांकन की कला ही है िजसके िलए िवशेषि जान, अभनुभिलव और योग्यता की आवश्यकता होती है। इसी तरह एक व्यवसाय के आन्तिरक एवं बाह्य पक्षो को िवत्तीय समंको का अभथर्व और इनके पिरवतर्वन इस प्रकार सम्प्रेिषित करना िजससे िक वे व्यवसाय के सम्बन्ध में सही िनणर्वय लेकर बुिद्धिमतापूर्णर्व कायर्ववाही कर सकें , लेखांकन की कला ही है।  िवजान के रूप में यह एक व्यविस्थत जान शाखा है। इसमें लेनदेनो एवं घटनाओं का अभिभिललेखन, वगीकरण एवं संिक्षिप्तिकरण के िनिश्चित िनयम है। इन िनिश्चित िनयमो के कारण ही लेखो का क्रमबद्धि व व्यविस्थत रूप से अभिभिललेखन िकया जाता है। िकन्तु यह एक 'पूर्णर्व िनिश्चित' (exact) िवजान न होकर 'लगभिलग पूर्णर्व िवजान' (exacting science) है।
  6. 6.  सवर्वप्रथम प्रारंिभिलक लेखांकन के िरकॉर्ड र्व प्राचीन बेबीलॉर्न, अभसीिरया और सुमेर ििया के खंड हरो में पाए गए, जो 7000 वषिों से भिली पहले की तारीख के हैं। तत्कालीन लोग फसलो और मवेिशयो की वृिद्धि को िरकॉर्ड र्व करने के िलए प्राचीन लेखांकन की पद्धिितयो पर भिलरोसा करते थे। क्योिक कृिषि और पशु पालन के िलए प्राकृितक ऋतु होती है, अभतः अभगर फसलो की पैदावार हो चुकी हो या पशुओं ने नए बच्चे पैदा िकए हो तो िहसाब-िकताब कर अभिधशेषि को िनधार्विरत करना आसान हो जाता है।
  7. 7. लेखांकन के उद्देश्य  लेखांकन के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार है -  िविधवत अिभलेख रखना  प्रत्येक व्यावसाियक लेन-देन को पुस्तको मे क्रिमबद्ध तरीके से िलखना व उिचत िहसाब रखना लेखांकन का प्रथम उद्देश्य है। लेखांकन के अभाव मे मानव स्मृित (याददास्त) पर बहुत भार होता िजसका अिधकांश दशाओं मे वहन करना असम्भव होता। िविधवत अिभलेखन से भूल व छल-कपटो को दूर करने मे सहायता िमलती है।  व्यावसाियक सम्पितयो को सुरिकत रखना[संपािदत करे]  लेखांकन व्यावसाियक सम्पितयो के अनुिचत एवं अवांछनीय उपयोग से सुरका करता है। ऐसा लेखांकन द्वारा प्रबन्ध को िनम्न सूचनाएं प्रदान करने के कारणि सम्भव होता है -  (१) व्यवसाय मे स्वािमयो के कोषो की िविनयोिजत रािश,  (२) व्यावसाय को अन्य व्यिकयो को िकतना देना है,  (३) व्यवसाय को अन्य व्यिकयो से िकतना वसूल करना है,  (४) व्यवसाय के पास स्थायी सम्पितयां, हस्तस्थ रोकड़, बैक शेष तथा कच्चा माल, अद्धर-िनिमरत माल एवं िनिमरत माल का स्टॉक िकतना है?  उपयुरक सूचना व्यवसाय स्वामी को यह जानने मे सहायक होती है िक व्यवसाय के कोष अनावश्यक रूप से िनिष्क्रिय तो नहीं पड़े है।
  8. 8.  लेखांकन की िवित्तीय प्रकृ िति (Financial Character)  लेखांकन मे मुद्रा मे मापन योग्य िवित्तीय प्रकृ िति की घटनाओं और व्यविहारों का ही लेखा िकया जातिा है। ऐसे व्यविहार जो िवित्तीय प्रकृ िति के नहीं होतिे, उनका लेखा पुस्तिकों मे नहीं िकया जातिा। उदाहरण के िलए, यिद एक संस्था के पास समिपरति वि िविश्विसनीय कमरचािरयों की एक टोली हो जो व्यविसाय के िलए बहुति उपयोगी है, का लेखा व्यविसाय की पुस्तिकों मे नहीं िकया जायेगा क्योंिक यह िवित्तीय प्रकृ िति की नहीं है तिथा इसे मुद्रा मे अभिभिव्यक्त नहीं िकया जा सकतिा।  सेविा कायर के रूप मे  लेखांकन िसद्धान्ति बोडर की पिरभिाषा के अभनुसार लेखांकन एक सेविा कायर है। इसका उद्देश्य व्याविसाियक िक्रियाओं के बारे मे पिरमाणात्मक िवित्तीय सूचनाएं उपलब्ध कराना है। लेखांकन के अभिन्तिम उत्पाद अभथारति् िवित्तीय िविविरण (लाभि-हािन खातिा वि िचट्ठा) उनके िलए उपयोगी है जो विैकिल्पक कायों के बारे मे िनणरय लेतिे है। लेखांकन स्वियं िकसी धन का सृजन नहीं करतिा है, यद्यपिप यह इसके उपयोगकतिारओं को उपयोगी सूचना उपलब्ध करातिा है जो इन्हे धन के सृजन एविं रख रखावि मे सहायक होतिा है।
  9. 9.  शुद्ध लाभि या हािन का िनधाररण  लेखांकन अभवििध के अभन्ति मे व्यविसाय संचालन के फलस्विरूप उत्पन्न शुद्ध लाभि अभथविा हािन का िनधाररण लेखांकन का प्रमुख उद्देश्य है। शुद्ध लाभि अभथविा हािन एविं िनिश्चति अभवििध के कु छ आगमों एविं कु छ व्ययों का अभन्तिर होतिा है। यिद आगमों की रािश अभिधक है तिो शुद्ध लाभि होगा तिथा िविपरीति पिरिस्थिति मे शुद्ध हािन। यह प्रबन्धकीय कु शलतिा तिथा व्यविसाय की प्रगिति का सूचक होतिा है। यही अभंशधािरयों मे लाभिांश िवितिरण का आधार होतिा है।  व्यविसाय की िवित्तीय िस्थिति का िनधाररण[संपािदति करे]  लाभि-हािन खातिे द्वारा प्रदत्त सूचना पयारप्त नहीं है। व्यविसायी अभपनी िवित्तीय िस्थिति भिी जानना चाहतिा है। इसकी पूितिर िचट्ठे द्वारा की जातिी है। िचट्ठा एक िविशेष ितििथ को व्यविसाय की सम्पित्तयों एविं दाियत्विों का िविविरण है। यह व्यविसाय के िवित्तीय स्विास्थ्य को जानने मे बैरोमीटर का कायर करतिा है।  िविविेकपूणर िनणरय लेने मे सहायक[संपािदति करे]  िविविेकपूणर िनणरय लेने के िलए सम्बिन्धति अभिधकिरयों एविं संस्था मे िहति रखने विाले िवििभिन्न पक्षकारों को विांिछति सूचना उपलब्ध कराना, लेखांकन का उद्देश्य है। अभमेिरकन अभकाउंिटंग एसोिसएशन ने भिी लेखांकन की पिरभिाषा देतिे हुए इस िबन्दु पर िविशेष बल िदया है। उनके अभनुसार,  ‘‘लेखांकन सूचना के उपयोगकतिारओं द्वारा िनणरयन हेतिु आिथरक सूचना को पहचानने, मापने तिथा सम्प्रेषण की प्रिक्रिया है।’’
  10. 10.  लेखा करना (Recording)  वगीकरण करना  संिकपीकरण (Summarizing)  िनवरचन करना (Interpreting)  सूचनाओ का संवहन (Communication of information)  वैधािनक आवशयकताओ की पूित
  11. 11. लेखांकन की आवशयकता  आधुनिनक व्यापािरक ियाक्रियाओ के सफल संचालन के िलए लेखांकन को एक आवशयकता (छमबमेपजल) समझा जाता है। लेखांकन क्यों आवशयक है, इसे िनम्न तकों से स्पष्ट ियाकया जा सकता है -  (१) व्यापािरक लेन-देन को िलिखत रप देना आवशयक होता है- व्यापार में प्रतितियादन अनिगनत लेन-देन होते है, इन्हें याद नहीं रखा जा सकता। इनको िलख लेना प्रतत्येक व्यापारी के िलए आवशयक होता है। पुनस्तपालन के माध्यम से इन लेन-देनों को भली-भांित िलखा जाता है।  (२) बेईमानी व जालसाजी आियाद से बचाव के िलए लेन-देनों का समुनिचत िववरण रखना होता है - व्यापार में िविभन्न लेन-देनों में ियाकसी प्रतकार की बेईमानी, धोखाधड़ी व जालसाजी न हो सके, इसके िलए लेन-देनों का समुनिचत तथा वैज्ञािनक िविध से लेखा होना चािहए। इस दृष्टिष्ट से भी पुनस्तपालन को एक आवशयक आवशयकता समझा जाता है।  (३) व्यापािरक करों के समुनिचत िनधाररण के िलए पुनस्तकें आवशयक होती है - एक व्यापारी अपने लेन-देनों के भली-भांित िलखने, लेखा पुनस्तकें रखने तथा अिन्तम खाते आियाद बनाने के बाद ही अपने कर- दाियत्व की जानकारी कर सकता है। पुनस्तपालन से लेन-देनों के समुनिचत लेखे रखे जाते है। िवक्रिय की कुनल रािशि तथा शिुनद्ध लाभ की सही व प्रतामािणक जानकारी िमलती है िजसके आधार पर िवक्रिय-कर व आयकर की रािशि के िनधाररण में सरलता हो जाती है।  (४) व्यापार के िवक्रिय-मूलय के िनधाररण में पुनस्तपालन के िनषकषर उपयोगी होते है - यियाद व्यापारी अपने व्यापार के वास्तिवक मूलय को जानना चाहता है या उसे उिचत मूलय पर बेचना चाहता है तो लेखा पुनस्तकें व्यापार की सम्पित्तियों व दाियत्वों आियाद के शिेषों के आधार पर व्यापार के उिचत मूलयांकन के आंकड़े प्रतस्तुनत करती है।
  12. 12. . पूंजी या लागत का पता लगाना- समस्त सम्पित्ति (जैसे मशिीन, भवन, रोकड़ इत्याियाद) में लगे हुए धन में से दाियत्व (जैसे लेनदार, बैक का ऋण इत्याियाद) को घटाकर ियाकसी िवशिेष समय पर व्यापारी अपनी पूंजी मालूम कर सकता है। 2. िविभन्न लेन-देनों को याद रखने का साधन - व्यापार में अनेकानेक लेन-देन होते है। उन सबको िलखकर ही याद रखा जा सकता है और उनके बारे में कोई जानकारी उसी समय सम्भव हो सकती है जब इसे ठीक प्रतकार से िलखा गया हो। 3. कमरचािरयों के छल-कपट से सुनरका- जब लेन-देनों को बहीखाते में िलख िलया जाता है तो कोई कमरचारी आसानी से धोखा, छल-कपट नहीं कर सकता और व्यापारी को लाभ का ठीक ज्ञान रहता है। यह बात िवशिेषकर उन व्यापािरयों के िलये अिधक महत्व की है जो अपने कमरचािरयों पर पूरी-पूरी दृष्टिष्ट नहीं रख पाते है। 4.    समुनिचत आयकर या िबक्रिी कर लगाने का आधार- अगर बहीखाते ठीक रखे जायें और उनमें सब लेनदेन िलिखत रप में हों तो कर अिधकािरयों को कर लगाने में सहायता िमलती है क्योंियाक िलखे हुए बहीखाते िहसाब की जांच के िलए पक्का सबूत माने जाते है। 5. व्यापार खरीदने बेचने में आसानी - ठीक-ठीक बहीखाते रखकर एक व्यापारी अपने कारोबार को बेचकर ियाकसी सीमा तक उिचत मूलय प्रताप कर सकता है। साथ ही साथ खरीदने वाले व्यापारी को भी यह संतोष रहता है ियाक उसे खरीदे हुऐ माल का अिधक मूलय नहीं देना पड़ा। 6. अदालती कामों में बहीखातों का प्रतमाण (सबूत) होना- जब कोई व्यापारी ियादवािलया हो जाता है (अथारत् उसके ऊपर ऋण, उसकी सम्पित्ति से अिधक हो जाता है) तो वह न्यायालय में बहीखाते ियादखाकर अपनी िनबरल िस्थित का सबूत दे सकता है और वह न्यायालय से अपने को ियादवािलया घोिषत करवा सकता है। उसके ऐसा करने पर उसकी सम्पित्ति उसके महाजनों के अनुनपात में बंट जाती है और व्यापारी ऋणों के दाियत्व से छूट जाता है। यियाद बहीखाते न हों तो न्यायालय व्यापारी को ियादवािलया घोिषत करने में संदेह कर सकता है। 7. व्यापािरक लाभ-हािन जानना - बही खातों में व्यापार व लाभ-हािन खाते िनिश्चित समय के अन्त में बनाकर कोई भी व्यापारी अपने व्यापार में लाभ या हािन मालूम कर सकता है। 8. िपछले आँकड़ों से तुनलना - समय-समय पर व्यापािरक आँकड़ों द्वारा अथारत् क्रिय-िवक्रिय, लाभ-हािन इत्याियाद की तुनलना िपछले सालों के आंकड़ों से करके व्यापार में आवशयक सुनधार ियाकए जा सकते है। 9. वस्तुनओ की कीमत लगाना- यियाद व्यापारी माल स्वयं तैयार कराता है और उन सब का िहसाब बहीखाते बनाकर रखता है तो उसे माल तैयार करने की लागत मालूम हो सकती है। लागत के आधार पर वह अपनी िनिमत वस्तुनओ का िवक्रिय मूलय िनधारिरत कर सकता है। 10. आिथक िस्थित का ज्ञान- बहीखाते रखकर व्यापारी हर समय यह मालूम कर सकता है ियाक उसकी व्यापािरक िस्थित संतोषजनक है अथवा नहीं।
  13. 13.  लेखांकन की अनेक प्रतणिलयाँ (systems) है िजनमें से िनम्निलिखत उललेखनीय है-  1. नकद लेन-देन (Cash system)  2. इकहरा लेखा प्रतणाली (Single Entry System)  3. दोहरा लेखा प्रतणाली (Double Entry System)  4. भारतीय बहीखाता प्रतणाली (Indian Book-Keeping System)
  14. 14. नकद लेन-देन (रोकड़) प्रतणाली इस प्रतणाली का प्रतयोग अिधकतर गैर व्यापािरक संस्थाओ जैसे क्लब, अनाथालय, पुनस्तकालय तथा अन्य समाज सेवी संस्थाओ द्वारा ियाकया जाता है। इन संस्थाओ का उदेशय लाभ कमाना नहीं होता और ये पुनस्तपालन से के वल यह जानना चाहती है ियाक उनके पास ियाकतनी रोकड़ आयी तथा ियाकतनी गयी और ियाकतनी शिेष है रोकड़ प्रतणाली के अन्तगरत के वल रोकड़ बही (कै शि बुनक) बनायी जाती है। इस पुनस्तक में सारे नकद लेनदेनों को िलखा जाता है। वषर के अन्त में कोई अिन्तम खाता या लाभ- हािन खाता आियाद नहीं बनाया जाता। आय-व्यय की िस्थित को समझने के िलए एक आय-व्यय खाता (Income & Expenditure Account) बनाया जाता
  15. 15. इकहरा लेखा प्रणाली  इस पद्धतिति मे नकद लेन-देनों को रोकड पुस्तिक मे तिथा उधार लेन देनों को खातिा बही मे िलखा जातिा है। यह प्रणाली मुख्यतिः छोटे फु टकर व्यापािरयों द्वारा प्रयोग की जातिी है। इस प्रकार पुस्तिके रखने से के वल यह जानकारी होतिी है िक व्यापारी की रोकड़ की िस्थिति कै सी है, अर्थार्थाति् िकतिनी रोकड़ आयी तिथा िकतिनी गयी तिथा िकतिनी शेष है। िकसको िकतिना देना है तिथा िकससे िकतिना लेना है, इसकी जानकारी खातिा बही से हो जातिी है। इस पद्धतिति से लाभ-हािन खातिा व आिथर्थाक िचिट्ठा बनाना संभव नहीं होतिा जब तिक िक इस प्रणाली को दोहरा लेखा प्रणाली मे बदल न िदया जाय। इसिलए इस प्रणाली को अर्पूर्णर्था प्रणाली माना जातिा है।
  16. 16. दोहरा लेखा प्रणाली  यह पुस्तिपालन की सबसे अर्च्छी प्रणाली मानी जातिी है। इस पद्धतिति मे प्रत्येक व्यवहार के दोनों रूपों (डेिबट व क्रे िडट या ऋण व धनी) का लेखा िकया जातिा है। यह कु छ िनिश्चिति िसद्धतान्तिों पर आधािरति होतिी है। वषर्था के अर्न्ति मे अर्िन्तिम खातिे बनाकर व्यवसाय की वास्तििवक िस्थिति की जानकारी करना इस पद्धतिति के माध्यम से आसान होतिा है।
  17. 17. भारतिीय बहीखातिा प्रणाली  यह भारति मे अर्त्यन्ति प्राचिीनकाल से प्रचििलति पद्धतिति है। अर्िधकांश भारतिीय व्यापारी इस प्रणाली के अर्नुसार ही अर्पना िहसाब-िकतिाब रखतिे है। यह भी िनिश्चिति िसद्धतान्तिों पर आधािरति पूर्णर्थातिया वैज्ञािनक प्रणाली है। इस प्रणाली के आधार पर भी वषर्था के अर्न्ति मे लाभ-हािन खातिा तिथा आिथर्थाक िचिट्ठा बनाया जातिा है।
  18. 18. लेखांकन की शाखाये  िवत्तीय लेखांकन (Financial accounting)  लागति लेखांकन (Cost accounting)  प्रबन्ध लेखांकन (Management Accounting)  मानव संसाधन लेखांकन (Human Resource Accounting-HRA)  मुद्रा-स्फीिति लेखांकन (Inflation Accounting)  सामािजक दाियत्व लेखांकन (Social Responsibility Accounting)
  19. 19. लेखांकन सूर्चिना के प्रमुख उपयोगकतिार्था  व्यवसाय का स्वामी  प्रबन्धकतिार्था  िविनयोजक (इन्वेस्टर)  लेनदार (Creditors)  िनयामक एजेिन्सयाँ (Regulatory Agencies)  सरकार  कमर्थाचिारी  शोधकतिार्था
  20. 20. खातिों के प्रकार  प्रत्येक लेनदेन मे दो पहलूर् या पक्ष होतिे है। खातिा-बही (Ledger) मे प्रत्येक पक्ष का एक खातिा बनाया जातिा है। खातिा (Account) खातिा बही (लेजर) का वह भाग है िजसमे व्यिक, वस्तिुओं अर्थवा सेवाओं के सम्बन्ध मे िकए हुए लेनदेनों का सामूर्िहक िववरण िलखा जातिा है। इस प्रकार प्रत्येक खातिे की िस्थिति का पतिा लग जातिा है िक वह खातिा लेनदार (Creditor) है तिथा देनदार (Detor)। दोहरी प्रणाली के अर्नुसार स्रोतिों मे लेनदेनों को िलखने के िलए खातिों के वगीकरण को जानना आवश्यक है।  खातिों के प्रकारव्यिकगति खातिे (Personal accounts)  1. एक व्यिक का खातिा, (जैसे राम का खातिा, मोहन का खातिा, पूर्ंजी खातिा)  2. फमर्था का खातिा (जैसे गुप्ता ब्रदसर्था, मै. गणेश प्रसाद राजीव कु मार)  अर्व्यिकगति खातिे (Impersonal accounts)  वास्तििवक खातिे (real accounts)  माल खातिा (Goods account),  रोकड खातिा (cash account)  मशीन खातिा  भवन खातिा आिद  नाममात्र खातिे (nominal accounts)  आय के खातिे  प्राप्त ब्याज खातिा  कमीशन खातिा, आिद  व्यय के खातिे  वेतिन खातिा  िकराया खातिा  मजदूर्री खातिा  ब्याज खातिा आिद
  21. 21. व्यिकगति खातिे  िजन खातिों का सम्बन्ध िकसी िवशेष व्यिक से होतिा है, वे व्यिकगति खातिे कहलातिे है। व्यिक का अर्थर्था स्वयं व्यिक, फमर्था, कम्पनी और अर्न्य िकसी प्रकार की व्यापािरक संस्था होतिा है। दूर्सरे शब्दों मे, सब लेनदारों तिथा देनदारों के खातिे व्यिकगति खातिे होतिे है। इस दृष्टिष्टि से पूर्ंजी (capital) तिथा आहरण (drawing) के खातिे भी व्यिकगति होतिे है क्योंिक इनमे व्यापार के स्वामी से सम्बिन्धति लेनदेन िलखे जातिे है। व्यापार के स्वामी के व्यिकगति खातिे को पूर्ंजी खातिा कहा जातिा है। व्यापार के स्वामी द्वारा व्यवसाय से मुद्रा िनकालने के िलए आहरण खातिा खोला जातिा है। इस प्रकार आहरण खातिा भी व्यिकगति खातिा होतिा है।
  22. 22. वास्तविवक खातवे  वस्तवुओं और सम्पत्तित्ति के खातवे वास्तविवक खातवे कहलातवे है। इन खातवों को वास्तविवक इसिलए कहा जातवा है िक इनमे विणरतव वस्तवुएं, िवशेष सम्पत्तित्ति के रूपत्त मे व्यापत्तार मे प्रयोग की जातवी है। आवश्यकतवा पत्तड़ने पत्तर इन्हे बेचकर व्यापत्तारी अपत्तनी पत्तूंजी को धन के रूपत्त मे पत्तिरवितवरतव कर सकतवा है। वास्तविवक खातवे आिथरक िचट्ठे मे सम्पत्तित्ति की तवरह िदिखाये जातवे है। जैसे मशीन, भवन, माल, यन्त, फर्नीचर, रोकड व बैक आिदि के वास्तविवक खातवे होतवे है।
  23. 23. नाममात के खातवे इन खातवों को अवास्तविवक खातवे भी कहतवे है। व्यापत्तार मे अनेक खचर की मदिे, आय की मदिे तवथा लाभ अथवा हािन की मदिे होतवी है। इन सबके िलए अलग-अलग खातवे बनतवे है िजनको ‘नाममात’ के खातवे कहतवे है। व्यिक्तिगतव अथवा वास्तविवक खातवों की तवरह इनका कोई मूतवर आधार नहीं होतवा। उदिाहरण के िलए वेतवन, मजदिूरी, कमीशन, ब्याज इत्यािदि के खातवे नाममात के खातवे होतवे है।
  24. 24. खातवे के भाग  प्रत्येक लेनदिेन के दिो पत्तक्ष होतवे है। ऋणी या डेिबट पत्तक्ष और धनी या क्रे िडट पत्तक्ष। इस कारण उसका लेखा िलखने के िलए प्रत्येक खातवे के दिो भाग होतवे है। बाये हाथ की ओर भाग ‘ऋणी पत्तक्ष’ (डेिबट साइड) होतवा है और दिािहने हाथ की ओर का भाग ‘धनी पत्तक्ष’ (क्रे िडट साइड) होतवा है।  खातवों को डेिबट या क्रे िडट करना - जब िकसी लेन-दिेन मे कोई खातवा ‘लेन’ पत्तक्ष होतवा है अथारतव् उसको लाभ प्राप्त होतवा है तवब उस खातवो को डेिबट िकया जातवा है। डेिबट करने का मतवलब यह है िक खातवे के ऋणी (डेिबट) भाग (बांये हाथ वाले भाग) मे लेनदिेन का लेखा होगा। इसी प्रकार जब कोई खातवा लेनदिेन मे दिेन पत्तक्ष होतवा है अथारतव् उसके द्वारा कु छ लाभ िकसी को होतवा है, तवब उस खातवे को क्रे िडट िकया जातवा है। अथारतव् उस खातवे के क्रे िडट भाग मे लेनदिेन का लेखा िकया जाएगा। प्रत्येक लेनदिेन मे इस तवरह एक खातवा (डेिबट) तवथा दिूसरा खातवा क्रे िडट िकया जातवा है। डेिबट (डेिबट) खातवे मे डेिबट की ओर लेखा तवथा क्रे िडट खातवे मे क्रे िडट की ओर लेखा होतवा है। क्रे िडट तवथा डेिबट लेखा दिोहरे लेखे की प्रणाली के अनुसार प्रत्येक लेनदिेन के िलए िकया जातवा है।  उदिाहरण - यिदि हमने मोहन से 100 रूपत्तये का माल खरीदिा है तवो इसमे दिो खातवे हुए- एक माल का दिूसरा मोहन का। एक लेखा पत्ताने वाले खातवे अथारतव् माल खातवे (goods account) मे िकया जाएगा और दिूसरा दिेने वाले खातवे अथारतव मोहन के खातवे मे िकया जाएगा।  इसी कारण इस प्रणाली को दिोहरे लेखे की प्रणाली कहा गया है। प्रत्येक लेनदिेन मे दिो लेखे एक डेिबट (डेिबट) और एक क्रे िडट होतवा है।
  25. 25. लेखांकन के सैद्धािन्तवक आधार  1. सामान्यतवः स्वीकृ तव लेखांकन िसद्धान्तव : िवत्तिीय िववरण सामान्यतवः स्वीकृ तव लेखांकन िसद्धान्तव के अनुसार तवैयार िकये जाने चािहए तवािक इनसे अन्तवः अविध तवथा अन्तवः कमर की तवुलना की जा सके ।  2. लेखांकन िसद्धान्तव - िकसी व्यवस्था या कायर के िनयंतण हेतवु प्रितवपत्तािदितव कोई िवचार िजसे व्यावसाियक वगर के सदिस्यों द्वारा स्वीकार कर िलया जातवा है। ये मनुष्य द्वारा िनिमरतव है। रसायन एवं भौतितवक िवज्ञान की तवरह सावरभौतिमक नहीं है।  3. लेखाशास्त्र के िसद्धान्तव सामान्य रूपत्त से तवभी स्वीकृ तव होतवे है जब उनमे तवीन लक्षण िवद्यमान हों, ये है - सम्बद्धतवा, वस्तवु पत्तरकतवा एवं सुगमतवा  4. सत्तिा की अवधारणा - व्यवसाय का उसके स्वािमयों तवथा प्रबंधकों से स्वतवंत एवं पत्तृथक अिस्तवत्व होतवा है। अतवः व्यवसाय का स्वामी भी पत्तूँजी के िलए व्यवसाय का लेनदिार माना जातवा है। व्यवसाय के स्वामी का पत्तृथक् अिस्तवत्व माना जातवा है। लाभों का एक भाग जो स्वामी के िहस्से मे आतवा है दिेय होतवा है और चालू दिाियत्व का।  5. मुद्रा मापत्त संबंधी अवधारणा - लेखांकन मौतिद्रक व्यवहारों से संबंिधतव है अमौतिद्रक घटनाएँ जैसे - कमरचािरयों को ईमानदिारी, स्वािमभिक्ति, कतवरव्यिनष्ठा आिदि का लेखांकन नहीं िकया जा सकतवा।  6. िनरन्तवरतवा की अवधारणा - यह बतवातवी है िक व्यवसाय दिीघरकाल तवक िनरन्तवर चलतवा रहेगा, जब तवक िक कोई िवपत्तरीतव कारण न हो। अमूतवर सम्पत्तित्तियों तवथा आिस्थगतव व्ययों का उनकी उपत्तयोिगतवा के आधार पत्तर प्रितववषर अपत्तलेखन, स्थायी सम्पत्तित्तियों को िचट्ठे मे अपत्तिलिखतव मूल्य पत्तर इसी आधार पत्तर िदिखाया जातवा है।  7. लागतव अवधारणा - िनरन्तवर की अवधारणा पत्तर आधािरतव है जो यह बतवातवी है िक सम्पत्तित्तियों को उनके लागतव मूल्य पत्तर दिजर िकया जातवा है।  8. लेखांकन की दिोहरा लेखा प्रणाली िद्वपत्तक्ष अवधारणा पत्तर आधािरतव है िजसके अनुसार प्रत्येक डेिबट के बराबर क्रे िडट होतवा है।  लेखांकन समीकरण िद्वपत्तक्ष अवधारणा पत्तर आधािरतव है।  9. व्यवसाय मे आगतव उस अविध मे प्राप्त मानी जातवी है जब ग्राहक के मूल्य के बदिले माल या सेवाये दिी जातवी है। िकन्तवु दिीघरकालीन ठेकों, सोने की खानों, जहाँ आय प्रािप्त अिनिश्चतव हो, मे आगम सुपत्तुदिरगी दिेने पत्तर नहीं मानी जातवी।  10. उपत्ताजरन अवधारणा के अनुसार व्यवसाय मे आय  -व्यय के मदिों का लेखा दिेय आधार पत्तर िकया जातवा है - जो िक उस अविध से संबंिधतव हो।
  26. 26. THANK YOU

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