Ce diaporama a bien été signalé.
Le téléchargement de votre SlideShare est en cours. ×

चमचा युग.pdf

Publicité
Publicité
Publicité
Publicité
Publicité
Publicité
Publicité
Publicité
Publicité
Publicité
Publicité
Publicité
Prochain SlideShare
Bol bharat bol
Bol bharat bol
Chargement dans…3
×

Consultez-les par la suite

1 sur 9 Publicité

चमचा युग.pdf

Télécharger pour lire hors ligne

चमचों की विभिन्न किस्में
बाबासाहब डॉ. भीमराव आंबेडकर के जीवनकाल में उनको केवल कांग्रेस और अनुसूचित जातियों के चमचों से ही निपटना पड़ा था। बाबासाहब के परिनिर्वाण के बाद अनेक नई-नई किस्मों के चमचों के उभर आने से स्थिति और खराब हो गई। उनके जाने के बाद, कांग्रेस के अलावा अन्य दलों को भी, केवल अनुसूचित जातियों से नहीं बल्कि अन्य समुदायों के बीच से भी, अपने चमचे बनाने की जरूरत महसूस हुई। इस तरह, भारी पैमाने पर चमचों की विभिन्न किस्में उभर कर सामने आईं।
(क) विभिन्न जातियों और समुदायों के चमचे
भारत की कुल जनसंख्या में लगभग 85% पीड़ित और शोषितलोग हैं, और उनका कोई नेता नहीं है। वास्तव में ऊंची जातियों के हिंदू उनमें नेतृत्वहीनता  की स्थिति पैदा करने में सफल हुए हैं। यह स्थिति इन जातियों और समुदायों में चमचे बनाने की दृष्टि से अत्यंत सहायक है। विभिन्न जातियों और समुदायों के अनुसार चमचों की निम्नलिखित श्रेणियाँ गिनाई जा सकती हैं।
1.अनुसूचित जातियां-अनिच्छुक चमचे
बीसवीं शताब्दी के दौरान अनुसूचित जातियों का समूचा संघर्ष यह इंगित करता है कि वे उज्जवल युग में प्रवेश का प्रयास कर रहे थे किंतु गांधी जी और कांग्रेस ने उन्हें चमचा युग  में धकेल दिया । वे उस दबाव में अभी भी कराह  रहे हैं, वे वर्तमान स्थिति को स्वीकार नहीं कर पाए हैं और उस से निकल ही नहीं पा रहे हैं इसलिए उन्हें अनिच्छुक चमचे कहा जा सकता है। 
2.अनुसूचित जनजातियां - नव दीक्षित चमचे
अनुसूचित जनजातियां भारत के संवैधानिक और आधुनिक विकास के दौरान संघर्ष के लिए नहीं जानी जातीं।  1940 के दशक में उन्हे भी अनुसूचित जातियों के साथ मान्यता और अधिकार मिलने लगे।  भारत के संविधान के अनुसार 26 जनवरी 1950 के बाद उन्हें अनुसूचित जातियों के समान ही मान्यता और अधिकार मिले।  यह सब उन्हें अनुसूचित जातियों के संघर्ष के परिणाम स्वरूप मिला, जिसके चलते राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मत  उत्पीड़ित और शोषित भारतीयों के पक्ष में हो गया था। 
आज तक उन्हें  भारत के केंद्रीय मंत्रिमंडल में कभी प्रतिनिधित्व  नहीं मिलता।  फिर भी उन्हें जो कुछ मिल पाता है, वे उसी से  संतुष्ट दिखाई पड़ते हैं, इससे भी खराब बात यह है कि वह अभी भी किसी मुगालते में हैं कि उनका उत्पीड़क और शोषक ही उनका हितैषी है।  इस तरह उन्हें नवदीक्षित चमचे  कहा जा सकता है क्योंकि उन्हें सीधे - सीधे चमचा युग में दीक्षित किया गया है। 
3.अन्य पिछड़ी जातियां - महत्वाकांक्षी चमचे
लंबे समय तक चले संघर्ष के बाद अनुसूचित जातियों के साथ अनुसूचित जनजातियों को मान्यता और अधिकार मिले।  इसके परिणाम स्वरूप उन लोगों ने अपनी सामर्थ्य और क्षमताओं से भी बहुत आगे निकल कर अपनी संभावनाओं को बेहतर कर लिया है।  यह बेहतरी शिक्षा, सरकारी नौकरियों और राजनीति के क्षेत्रों में सबसे अधिक दिखाई देती है। 
अनुसूचित जातियों और जनजातियों में इस तरह की बेहतरी ने अन्य पिछड़ी जातियों की महत्वाकांक्षाओं को जगा दिया है।  अभी तक तो वे इस महत्वाकांक्षा को पूरा करने में सफल नहीं हुए हैं।  पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने हर दरवाजे पर दस्तक दी उनके लिए कोई दरवाजा नहीं खुला।  अभी जून 1982 में हरियाणा में हुए चुनाव में हमें उन्हें निकट से देखने का मौका मिला। 
अन्य पिछड़ी जातियों के तथाकथित छोटे नेता टिकट के लिए हर एक दरवाजा रहे थे अंत में हमने देखा कि वे  हरियाणा की 90 सीटों में से एक टिकट कांग्रेस(आई) से और एक टिकट लोक दल से ले पाये।  आज हरियाणा विधानसभा में अन्य पिछड़ी जाति का केवल एक विधायक है। 

चमचों की विभिन्न किस्में
बाबासाहब डॉ. भीमराव आंबेडकर के जीवनकाल में उनको केवल कांग्रेस और अनुसूचित जातियों के चमचों से ही निपटना पड़ा था। बाबासाहब के परिनिर्वाण के बाद अनेक नई-नई किस्मों के चमचों के उभर आने से स्थिति और खराब हो गई। उनके जाने के बाद, कांग्रेस के अलावा अन्य दलों को भी, केवल अनुसूचित जातियों से नहीं बल्कि अन्य समुदायों के बीच से भी, अपने चमचे बनाने की जरूरत महसूस हुई। इस तरह, भारी पैमाने पर चमचों की विभिन्न किस्में उभर कर सामने आईं।
(क) विभिन्न जातियों और समुदायों के चमचे
भारत की कुल जनसंख्या में लगभग 85% पीड़ित और शोषितलोग हैं, और उनका कोई नेता नहीं है। वास्तव में ऊंची जातियों के हिंदू उनमें नेतृत्वहीनता  की स्थिति पैदा करने में सफल हुए हैं। यह स्थिति इन जातियों और समुदायों में चमचे बनाने की दृष्टि से अत्यंत सहायक है। विभिन्न जातियों और समुदायों के अनुसार चमचों की निम्नलिखित श्रेणियाँ गिनाई जा सकती हैं।
1.अनुसूचित जातियां-अनिच्छुक चमचे
बीसवीं शताब्दी के दौरान अनुसूचित जातियों का समूचा संघर्ष यह इंगित करता है कि वे उज्जवल युग में प्रवेश का प्रयास कर रहे थे किंतु गांधी जी और कांग्रेस ने उन्हें चमचा युग  में धकेल दिया । वे उस दबाव में अभी भी कराह  रहे हैं, वे वर्तमान स्थिति को स्वीकार नहीं कर पाए हैं और उस से निकल ही नहीं पा रहे हैं इसलिए उन्हें अनिच्छुक चमचे कहा जा सकता है। 
2.अनुसूचित जनजातियां - नव दीक्षित चमचे
अनुसूचित जनजातियां भारत के संवैधानिक और आधुनिक विकास के दौरान संघर्ष के लिए नहीं जानी जातीं।  1940 के दशक में उन्हे भी अनुसूचित जातियों के साथ मान्यता और अधिकार मिलने लगे।  भारत के संविधान के अनुसार 26 जनवरी 1950 के बाद उन्हें अनुसूचित जातियों के समान ही मान्यता और अधिकार मिले।  यह सब उन्हें अनुसूचित जातियों के संघर्ष के परिणाम स्वरूप मिला, जिसके चलते राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मत  उत्पीड़ित और शोषित भारतीयों के पक्ष में हो गया था। 
आज तक उन्हें  भारत के केंद्रीय मंत्रिमंडल में कभी प्रतिनिधित्व  नहीं मिलता।  फिर भी उन्हें जो कुछ मिल पाता है, वे उसी से  संतुष्ट दिखाई पड़ते हैं, इससे भी खराब बात यह है कि वह अभी भी किसी मुगालते में हैं कि उनका उत्पीड़क और शोषक ही उनका हितैषी है।  इस तरह उन्हें नवदीक्षित चमचे  कहा जा सकता है क्योंकि उन्हें सीधे - सीधे चमचा युग में दीक्षित किया गया है। 
3.अन्य पिछड़ी जातियां - महत्वाकांक्षी चमचे
लंबे समय तक चले संघर्ष के बाद अनुसूचित जातियों के साथ अनुसूचित जनजातियों को मान्यता और अधिकार मिले।  इसके परिणाम स्वरूप उन लोगों ने अपनी सामर्थ्य और क्षमताओं से भी बहुत आगे निकल कर अपनी संभावनाओं को बेहतर कर लिया है।  यह बेहतरी शिक्षा, सरकारी नौकरियों और राजनीति के क्षेत्रों में सबसे अधिक दिखाई देती है। 
अनुसूचित जातियों और जनजातियों में इस तरह की बेहतरी ने अन्य पिछड़ी जातियों की महत्वाकांक्षाओं को जगा दिया है।  अभी तक तो वे इस महत्वाकांक्षा को पूरा करने में सफल नहीं हुए हैं।  पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने हर दरवाजे पर दस्तक दी उनके लिए कोई दरवाजा नहीं खुला।  अभी जून 1982 में हरियाणा में हुए चुनाव में हमें उन्हें निकट से देखने का मौका मिला। 
अन्य पिछड़ी जातियों के तथाकथित छोटे नेता टिकट के लिए हर एक दरवाजा रहे थे अंत में हमने देखा कि वे  हरियाणा की 90 सीटों में से एक टिकट कांग्रेस(आई) से और एक टिकट लोक दल से ले पाये।  आज हरियाणा विधानसभा में अन्य पिछड़ी जाति का केवल एक विधायक है। 

Publicité
Publicité

Plus De Contenu Connexe

Similaire à चमचा युग.pdf (20)

Publicité

चमचा युग.pdf

  1. 1. चमचा युग बाबासाहब डॉ. भीमराव आंबेडकर क े बाद अगर बहुजन क े सबसे बड़े मसीहा अगर मा यवर कांशीराम को कहा जाए तो कोई अ तशयोि त नह ं होगी, उ ह ने हा शये पर पड़े वं चत वग को मु यधारा म लाने क े लए अपनी पूर िज़ंदगी लगा द । उ ह ने बहुजन वग क े राज न तक एक करण और उ थान क े लए अपना सव व याग दया, मा यवर कांशीराम साहब ने 1982 म चमचा युग नामक बुक लखी। इस पु तक को लखने का उनका उ दे य यह था क द लत-शो षत समाज और इसक े कायकताओं और नेताओं को हमारे द लत और शो षत समाज म चमच क े इस त व क बड़े पैमाने पर मौजूदगी क े बारे म अवगत , जाग क , और सावधान कया जाए, इस पु तक को तैयार करने का एक उ दे य यह भी था क जन साधारण, वशेषकर कायकताओं को इस यो य बनाया जाए क वे असल और नकल नेतृ व म भेद कर सक।
  2. 2. चमचा युग
  3. 3. चमचा युग म चमच क े मु य क म इस कार ह :- चमच क व भ न क म बाबासाहब डॉ. भीमराव आंबेडकर क े जीवनकाल म उनको क े वल कां ेस और अनुसू चत जा तय क े चमच से ह नपटना पड़ा था। बाबासाहब क े प र नवाण क े बाद अनेक नई-नई क म क े चमच क े उभर आने से ि थ त और खराब हो गई। उनक े जाने क े बाद, कां ेस क े अलावा अ य दल को भी, क े वल अनुसू चत जा तय से नह ं बि क अ य समुदाय क े बीच से भी, अपने चमचे बनाने क ज रत महसूस हुई। इस तरह, भार पैमाने पर चमच क व भ न क म उभर कर सामने आ । (क) व भ न जा तय और समुदाय क े चमचे भारत क क ु ल जनसं या म लगभग 85% पी ड़त और शो षतलोग ह, और उनका कोई नेता नह ं है। वा तव म ऊ ं ची जा तय क े हंदू उनम नेतृ वह नता क ि थ त पैदा करने म सफल हुए ह। यह ि थ त इन जा तय और समुदाय म चमचे बनाने क ि ट से अ यंत सहायक है। व भ न जा तय और समुदाय क े अनुसार चमच क न न ल खत े णयाँ गनाई जा सकती ह। 1.अनुसू चत जा तयां-अ न छ ु क चमचे बीसवीं शता द क े दौरान अनुसू चत जा तय का समूचा संघष यह इं गत करता है क वे उ जवल युग म वेश का यास कर रहे थे कं तु गांधी जी और कां ेस ने उ ह चमचा युग म धक े ल दया । वे उस दबाव म अभी भी कराह रहे ह, वे वतमान ि थ त को वीकार नह ं कर पाए ह और उस से नकल ह नह ं पा रहे ह इस लए उ ह अ न छ ु क चमचे कहा जा सकता है। 2.अनुसू चत जनजा तयां - नव द त चमचे अनुसू चत जनजा तयां भारत क े संवैधा नक और आधु नक वकास क े दौरान संघष क े लए नह ं जानी जातीं। 1940 क े दशक म उ हे भी अनुसू चत जा तय क े साथ मा यता और अ धकार मलने लगे। भारत क े सं वधान क े अनुसार 26 जनवर 1950 क े बाद उ ह अनुसू चत जा तय क े समान ह मा यता और अ धकार मले। यह सब उ ह अनुसू चत जा तय क े संघष क े प रणाम व प मला, िजसक े चलते रा य और अंतररा य मत उ पी ड़त और शो षत भारतीय क े प म हो गया था। आज तक उ ह भारत क े क य मं मंडल म कभी त न ध व नह ं मलता। फर भी उ ह जो क ु छ मल पाता है, वे उसी से संतु ट दखाई पड़ते ह, इससे भी खराब बात यह है क वह अभी भी
  4. 4. कसी मुगालते म ह क उनका उ पीड़क और शोषक ह उनका हतैषी है। इस तरह उ ह नवद त चमचे कहा जा सकता है य क उ ह सीधे - सीधे चमचा युग म द त कया गया है। 3.अ य पछड़ी जा तयां - मह वाकां ी चमचे लंबे समय तक चले संघष क े बाद अनुसू चत जा तय क े साथ अनुसू चत जनजा तय को मा यता और अ धकार मले। इसक े प रणाम व प उन लोग ने अपनी साम य और मताओं से भी बहुत आगे नकल कर अपनी संभावनाओं को बेहतर कर लया है। यह बेहतर श ा, सरकार नौक रय और राजनी त क े े म सबसे अ धक दखाई देती है। अनुसू चत जा तय और जनजा तय म इस तरह क बेहतर ने अ य पछड़ी जा तय क मह वाकां ाओं को जगा दया है। अभी तक तो वे इस मह वाकां ा को पूरा करने म सफल नह ं हुए ह। पछले क ु छ वष म उ ह ने हर दरवाजे पर द तक द उनक े लए कोई दरवाजा नह ं खुला। अभी जून 1982 म ह रयाणा म हुए चुनाव म हम उ ह नकट से देखने का मौका मला। अ य पछड़ी जा तय क े तथाक थत छोटे नेता टकट क े लए हर एक दरवाजा रहे थे अंत म हमने देखा क वे ह रयाणा क 90 सीट म से एक टकट कां ेस(आई) से और एक टकट लोक दल से ले पाये। आज ह रयाणा वधानसभा म अ य पछड़ी जा त का क े वल एक वधायक है। क ु छ थान वशेषकर द ण क े क ु छ थान को छोड़ कर हम उ ह अनेक थान और अनेक तर पर संघष करने क े बावजूद अपने अ धकार पाने से वं चत देखते ह। जैसा क ह रयाणा म है वा तव म उनक एक बड़ी सं या म सब पाना चाहती है जो अनुसू चत जा तय और अनुसू चत जनजा तय को पहले ह मला हुआ है। 3700 से अ धक अ य पछड़ी जा तय म से लगभग 1000 जा तयां ना क े वल अनुसू चत जा त /अनुसू चत जनजा त क सूची म सि म लत कए जाने क मह वाकां ा कर रह ह। बि क उसक े लए संघष कर रह ह। इस कार अ य पछड़ी जा तय का क ु ल यवहार हम इस ओर ले जाता है क वह मह वाकां ी चमचे ह। 4. अ पसं यक - असहाय चमचे सन 1971 क जनगणना क े अनुसार भारत क क ु ल जनसं या म धा मक अ पसं यक का तशत 17.28 है। 15 अग त 1947 को भारत क े अं ेज क े भारत छोड़ने से पहले उ ह उनक आबाद क े अनुसार उनका अ धकार मल रहा था। उसक े बाद तो वह पूरे तौर पर भारत क शासक जा तय
  5. 5. क दया पर नभर हो गए। सां दा यक दंग क बहुतायत होने क े कारण मुसलमान चौक ने रहते ह। ईसाई बेबस घसट रहे ह। सख स मानजनक जीवन क े लए संघष कर रहे ह। बौ ध तो संभाल भी नह ं पाये ह। इस सबसे यह मा णत होता है क भारत क े अ पसं यक असहाय चमचे ह। (ख) व भ न दल क े चमचे "कां ेस का दूसरा दु कृ य था अछ ू त काँ े सय से कठोर पाट अनुशासन का पालन करवाना। वे पूरे तौर पर कां ेस कायका रणी क े नयं ण म थे । वे ऐसा कोई सवाल नह ं पुछ सकते थे जो कायका रणी को पसंद न हो। वे ऐसा कोई ताव नह ं रख सकते थे िजसम उसक अनुम त न हो। वे ऐसा वधान नह ं ला सकते थे िजस पर उसे आप हो। वे अपनी इ छानुसार मतदान नह ं कर सकते थे और जो सोचते थे वह बोल भी नह ं सकते थे। वे वहाँ हाँक े हुए म व शय क तरह थे। अछ ू त क े लए वधा यका म त न ध व ा त करने का एक उ दे य उ ह इस यो य बनाना है क वे अपनी शकायत को य त कर सक और अपनी गल तय को सुधार सक। कां ेस ऐसा न होने देने क े अपने यास म सफल और कारगर रह ।" “इस लंबी और दुखद कहानी का अंत करने क े लए कां ेस ने पूना समझौते का रस चूस लया और छलका अछ ू त क े मुह पर फक दया।" - डॉ. भीमराव आंबेडकर अनुसू चत जा तय क े वधायक क असहायता का वणन डॉ. आंबेडकर ने अपनी पु तक 'काँ ेस और गांधी ने अछ ू त क े लए या कया' म कया है। यह ि थ त 1945 म थी। आने वाले वष म, हम और भी खराब हालत और भी बड़े पैमाने पर देखने को मले। उस समय इस तरह का यवहार करने और अनुसू चत जा तय म से चमचे बनाने वाल ऊ ं ची जा तय क े हंदुओं क रा य तर पर 7 पा टयां और रा य तथा े ीय तर क अनेक पा टयां ह जो क े वल अनुसू चत जा तय से ह नह ं बि क भारत क े सभी उ पी ड़त और शो षत समुदाय से चमचे पैदा कर रह ं ह। आज ऊ ं ची जा तय क े हंदुओं क ये सभी पा टयां रस चूस रह ह और छलका उन 85% उ पी ड़त और शो षत भारतीय क े मुंह पर फक रह ह। इस कार , व भ न दल म चमच क े इस नमाण ने हमारे लए हालत और भी बदतर कर दए ह। जो लोग सम या से नपटना चाहते ह वे अपने सामने खड़ी और भी बड़ी सम या क े इस पहलू को अनदेखा नह ं कर सकते।
  6. 6. (ग) अ ानी चमचे भारत क े उ पी ड़त लोग, वशेषकर द लत वग, लगभग पूरे भारत म अ याय क े खलाफ जूझ रहे थे। उनक े अ धकांश संघष थानीय और े ीय रहे। देश क जनसं या और आकार को यान म रखते हुए, हम कह सकते ह क वे संघष लगभग अलग थलग रहकर कए गए क वे समूह का संघष तीत होते ह। उन समूहगत संघष म,  लोग क े वल अपने ह संघष क े बारे म जानते थे और अ य चल रहे अपने बंधुओं क े अ य संघष क े बारे म अनजान रहते थे। द लत वग क इस अ मता क क पना इस त य से क जा सकती है क द लत वग क एक बड़ी जमात उनक े ह लए, कए गए डॉ.  आंबेडकर क े आजीवन संघष क े बारे म ब क ु ल अनजान बनी रह । आज भी भारत म अनुसू चत जा तय क े लगभग 50% लोग डॉ. आंबेडकर क े जीवन और मकसद क े बारे म अनजान ह। अनुसू चत जा तय , अनुसू चत जनजा तय और अ य पछड़ी जा तय क इस यापक तर क अ ानता का ऊ ं ची जा तय क े हंदुओं ने लाभ उठाया। उनक अ ानता और अ य कमजो रय का लाभ उठाते हुए ऊ ं ची जा तय क े हंदुओं ने उनम आसानी से चमचे बना लये। इस क म क े चमच को अ ानी चमचे कहा जा सकता है। यह अ ानी चमचे डॉ.  आंबेडकर क े जीवन काल म उनक े लए बड़ा सरदद बने रहे। अपनी स ध पु तक 'काँ ेस और गांधी ने अछ ू त क े लए या कया'  म उ ह ने इसक े क ु छ उदाहरण दए ह। अ ानी त व का एक ऐसा उदाहरण इस कार है :- ेस जनल,  दनांक 14 . 4. 45 क े अनुसार रायबहादुर मेहरचंद ख ना नाम क े एक स जन ने ड े ड लासेस ल ग क े त वाधान म 12 अ ैल 1945 को पेशावर म आयोिजत अछ ू त क सभा म क थत तौर पर कहा था --- आप क े सबसे अ छे म महा मा गांधी ह, उ ह ने आप क खा तर अनशन तक कया और पूना समझौता कया िजसक े तहत आप को वोट डालने का हक मला और थानीय नकाय और वधा यका म नुमाइंदगी द गई। मुझे पता है क आप म से क ु छ लोग डॉ.  आंबेडकर क े पीछे भाग रहे ह, जो महज अं ेज सा ा य वा दय क देन है और जो अं ेजी हुक ू मत क े हाथ मजबूत करने क े लए आप का इ तेमाल करते ह। ता क भारत का वभाजन हो जाए और स ा उनक े हाथ म बनी रहे। म आपक े हत म आप से अपील करता हूं क आप वयंभू नेताओं और अपने स चे दो त म फक कर।
  7. 7. द लत वग क इसी अ ान क े चलते ऊ ं ची जा तय क े ह दू उ ह आसानी से गुमराह कर लेते थे। वे उ ह व वास दला देते थे क उनक े अ धकार को हड़पने वाला ह उनका उ धारक है। इस तरह बड़ी सं या म द लत को गुमराह कया गया और उ ह आसानी से अ ानी चमचे बना लया गया। (घ) बु ध चमचे अथवा अंबेडकरवाद चमचे हमने अ ानी लोग पर गौर कया और इस बात पर भी क उनम से चमचे क ै से बनाए गए। कं तु चमचा युग म सबसे दुखद ह सा है बु ध चमचे अथवा अंबेडकरवाद चमचे । डॉ. आंबेडकर ने वयं यह बताया था क अ ानी जनसमूह को अछ ू त क े संघष म गांधी जी और डॉ.  आंबेडकर क भू मका क े बारे म क ै से गुमराह कया गया। हम अ ानी जनसमूह क े आचरण को समझ सकते ह। कं तु बु ध लोग ,  वशेषकर वयं डॉ आंबेडकर वारा बु ध कए गए लोग क े आचरण का या कर। इन बु ध लोग को गांधी जी और डॉ.  आंबेडकर क भू मका क े बारे म पता होना ह चा हए। हम यह जानकर त ध रह गए क इन बु ध चमच ने लगभग 1 वष पहले 24 सतंबर 1982 को पूना समझौते क वण जयंती मनाने क े लए पुणे म एक स म त बनाई। 1 वष पहले ह बना ल गई इस स म त म आर. पी . आई क े महास चव,  द लत पथस क े पदा धकार और डॉ.  अंबेडकर क े ह बु ध समुदाय क े क ु छ व र ठ अ धकार शा मल थे। अब पूना समझौते को प रण त तक पहुंचाने म गांधी जी और डॉ.  आंबेडकर क भू मका को अ छे से जानते हुए,  पेशावर क े अपने अ ानी बंधुओं क े वपर त पूना क े बु ध लोग पूना समझौते क वण जयंती मनाने क े बारे म सोच भी नह ं सकते थे। कं तु ये आंबेडकरवाद चमचे वण जयंती क े बारे म क े वल सोच ह नह ं रहे थे , बि क 1 साल पहले से ह उसक जोर शोर से तैयार भी कर रहे थे । इससे भी अ धक बुर बात यह है क इन लोग ने डॉ. आंबेडकर क सलाह पर और म टर आर आर भोले क े नेतृ व म 1946 म पुणे समझौते क नंदा क थी,  वे भी वण जयंती मनाने क े लए वयं को तैयार कर रहे थे। क े वल इसी को नह ं बि क उनक े सवागीण आचरण को भी और पछले कई साल से टुकड़खोर पर उनक त परता को यान म रखते हुए , हमने इस क म क े बु ध चमच अथवा अंबेडकरवाद चमच का नाम देने का फ ै सला कया है।
  8. 8. (च) चमच क े चमचे वय क मता धकार पर आधा रत लोकतां क यव था क राजनी तक अ नवायताओं ने उ ह भारत क शासक जा तय को बा य कर दया क वे भारत क उ पी ड़त और शो षत जा तय और समुदाय म से चमचे बनाएं। इस कार हम राजनी तक ग त व धय क े व भ न तर पर चमच क बहुतायत दखाई देती है। इन राजनी तक चमच क यो यता क परख उनक अपनी अपनी जा तय म उनक े अनुया यय क सं या से होती है । ऊ ं चे और बड़े तर पर स य चमचे अपने बूते पर बड़े काम नह ं संभाल सकते। इस तरह,  शासक जा तय क पूर तौर पर और न ठा से सेवा करने क े लए उ ह चमचे बनाने क ज रत होती है इसक े अ त र त अनुसू चत जा तय और अनुसू चत जनजा तय क े श त कमचा रय क बढ़ती ह जा रह सं या से ऐसे चमचे बनाने क े लए एक उपजाऊ भू म तैयार होती है। श त कमचा रय क े इस वग म मौजूद चालाक लोग राजनी तक चमच से अनु चत अनु ह और लाभ ा त करने क े लए उनक चमचा गर करते ह । समय क े साथ ऐसे यि तय क सं या बढ़ती जा रह है। इस वग क े प ठूओं को चमच क े चमचे कहा जा सकता है। (छ) वदेश ि थत चमचे भारत म य क उ पी ड़त का कोई वतं आंदोलन नह ं है,  इस लए वगत वष क े पसंद दा और अघाए चमचे शांत है । भारत म चमच का यह न न तर 1980 क े लोकसभा और वधानसभा चुनाव क े बाद ब क ु ल न नतम तर पर पहुंच गया। भारत म अघाए चमच क े इस न न तर क े चलते वदेश म रह रहे अनेक अछ ू त अवसर वा दय ने गलती से यह समझ लया क भारत म चमच का अभाव है। मानो इस र त थान को भरने क े लए अनेक वाथ और अवसरवाद चमचे भारत क ओर दौड़ पड़े। अमे रका से आए ऐसे ह एक यो य यि त को द ल म और उसक े आसपास अपने आपको शासक दल क े चमचे क े तौर पर जमा लेने क फ ू हड़ को शश करते हुए देखा गया । भारत म लंबे समय तक ठहरने क े दौरान उसका मोहभंग हो गया और वह वापस अमे रका जाकर वहां यूयॉक सट क कां ेस (आई) म शा मल हो गया। ऐसे तमाम वाथ अछ ू त को लगभग मोहभंग क ि थ त म अपने-अपने वदेश म लौटना पड़ा। मने इन अधपक को शश क ओर गौर करने का फ ै सला इस लए कया है य क वदेश म
  9. 9. चमचे ह जो पास म छप रहे ह। जब भारत म उ पी ड़त भारतीय का आंदोलन मजबूत हो जाएगा तो वह फर से खुले म आ जाएंगे।  

×