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विविध अंगी विविध योग
योग माने की . . . 
योगवासिष्ट के मुतासिक 
 िंिारोत्तरणे युस तयोगशब्देन कथ्यते। 
भगवद गीता के मुतासिक 
 िमत्वं योग उच्यते...
कममयोग
कममयोग 
इिमेंकोई िंशय नहीं की कोई भी मनुष्य सकिी भी वि क्षणभर िुद्दा 
कममकरते रहता है । योंसक वह प्रकृसत के गुणों िे पराधी...
कममयोग 
 कमम का कम िे कम िंचय करके जन्म मरण के फे रे िे िहार 
सनकलना और परमात्मा मेंसवलीन होने का प्रयाि याने योग और 
परम...
कममयोग 
 कममके मागम में– 
 स्वधममिमज के करना 
 िमरि हो के करना 
 कुशलता िेकममकरना – शरीर और सचत्त 
 िमत्व िुसद्द िेकर...
कममयोग 
 कममयोग के टप्पे (steps) 
 दृविकोण विशाल हो जाता है 
 योग के आधीन वकये गये कमम सेसमाज का कल्याण होता है 
 अहंक...
भवियोग
भवियोग 
 भसि का मतलि है– ईश्वरके असस्तत्व की िवमत्र और ितत जाणीव 
और उिके प्रसत आत्मिमपमण करना । 
पंसित श्रीपद शास्त्री स...
भवियोग 
 नारदमुसन की भसि की पररभाषा – 
नारदस्त तदसपमता सिला चारता । 
तद सवस्मरणेपरमव्या कुलतेसत ॥ ना. भ. िूत्र १९ 
 अपने...
भवियोग 
 भसि का मागम– नवधा भसि 
श्रवणं कीतमन सवष्णो: स्मरणं पादिेवनम । 
अचमनं वंदनं दास्यं िख्यामात्म सनवेदनम ॥
 भसि के भाव – 
 शांत – सभष्म 
 दास्य – हनुमान 
 िाख्य – अजमनु 
 वात्िल्य – यशोदा 
 माधुयम - राधा 
भवियोग
भवियोग 
 भसि योग की सवसशĶता 
 Simple compare to other Yog – 
 राजयोग मेंशरीर िौष्टव; 
 ज्ञानयोग मेंवैराग्य; 
 कममयोग ...
ज्ञानयोग
ज्ञानयोग 
 मैंकौन ह ूँ। 
 स्थल और काल की मयामदा नहीं ऐिेशाश्वत ित्य या है, ऐिेतत्त्वज्ञान 
के प्रश्न कर के उिके उत्तर, स...
 िमथम के मुतासिक - 
ज्ञानयोग 
एक ज्ञानाचेलक्षण । ज्ञान म्हसणजेआत्मज्ञान । 
पहावेआपणासि आपण । या नावे ज्ञान ॥ 
 योग िाधना...
Different path of yog selected to achieve the 
eternal has same requirement and result 
 सनरंतर और दीर्मकाल पयमन्त िाधना ...
राजयोग
राजयोग 
 पतंजसल के अĶांग योग को ही राजयोग कहते है। 
 पतंजसल के मुजि – 
 योगसित्तवसृत्तसनरोधः । प.यो.ि.ू१.२ ॥
राजयोग 
 राजयोग – िसहरंग योग िाधना । 
 यम: िमाज मेंरहने के िाथ पालने के सनयम । 
 सनयम: व्यसि को अपने जीवन मेंपालने के स...
राजयोग 
 राजयोग – अंतरंग िाधना 
 प्रत्याहार: िवम इसन्ियों को िाहर के सवषय िेअंतरंग तरफ मोड़ना | 
 धारणा: सचत्त को एक सवष...
 योग का प्रवाि : 
राजयोग 
स्थूल िेिूक्ष्म तक और 
िूक्ष्म िेअनंत की तरफ
जप योग
 अंतरंग योगसाधना की पूिम तैयारी 
 महत्त्ि के अंग - 
 वलवित 
 िाविक (िैिरी) - उच्िार स्थान – 
मुख; मध्यमा (कंठ); पश्यन्...
 िमथम के मुतासिक, 
जप योग 
श्वािािरोिर र्ेता िो | िोसिता अहम | 
ऐिेचाले| िोिहम् िोिहम् || 
 कोई भी पद्दसत (method) िेकरे...
मंत्र योग
मंत्र योग 
 मंत्र योग 
 मंत्र के द्वारा मन को अंदर की तरफ मोड़ना 
 शब्दप्रधान या तो ध्वसन प्रधान मंत्र 
 ध्वसनप्रधान मं...
हठ योग
हठ योग 
 ह – िूयम वाचक, ठ – चंि वाचक 
 िूयम और चंि, येदोनों जीवन के द्वन्द्व का प्रसतक है 
 िूयम नािी और चंि नािी, येदो...
नाद योग / लय योग
नाद योग / लय योग 
 नाद िेअनुिंधान 
 नादयोग की िूक्ष्म ध्वसन लहेरों िे जुड़ना 
 अवणमनीय आनंद की अनुभूसत 
 मन और मज्जािंस...
Summary 
 स्वभाव के अनुिार सवसवध योग की उपयोसगता 
 सियाशील व्यसि – कममयोग 
 िंवेदनशील व्यसि – भसियोग 
 िंयमशील व्यसि –...
|| हरी ॐ ||
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Vividh angi vividh yog

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various yoga, limbs of yoga, parts of yoga, raja yoga, bhakti yoga, karma yoga, gyan yoga, etc

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Vividh angi vividh yog

  1. 1. विविध अंगी विविध योग
  2. 2. योग माने की . . . योगवासिष्ट के मुतासिक  िंिारोत्तरणे युस तयोगशब्देन कथ्यते। भगवद गीता के मुतासिक  िमत्वं योग उच्यते। योग का उĥेश्य और सवसवध प्रकार कममयोग भसि योग ज्ञानयोग  राजयोग जपयोग मंत्रयोग हठयोग नादयोग/ लय योग
  3. 3. कममयोग
  4. 4. कममयोग इिमेंकोई िंशय नहीं की कोई भी मनुष्य सकिी भी वि क्षणभर िुद्दा कममकरते रहता है । योंसक वह प्रकृसत के गुणों िे पराधीन होने के कारण कममकरने का सहस्िा िन जाता है। योगः कममिु कौशलम् ।
  5. 5. कममयोग  कमम का कम िे कम िंचय करके जन्म मरण के फे रे िे िहार सनकलना और परमात्मा मेंसवलीन होने का प्रयाि याने योग और परमात्मा मेंसवलीन होना भी योग . . .  योग ही िाधन हैऔर योग ही िाध्य ।
  6. 6. कममयोग  कममके मागम में–  स्वधममिमज के करना  िमरि हो के करना  कुशलता िेकममकरना – शरीर और सचत्त  िमत्व िुसद्द िेकरना और कममफल का त्याग करना
  7. 7. कममयोग  कममयोग के टप्पे (steps)  दृविकोण विशाल हो जाता है  योग के आधीन वकये गये कमम सेसमाज का कल्याण होता है  अहंकार का धीरे धीरे नाश होता है  वित्तशुवि होती है  ब्रह्मज्ञान की प्रावि होती है  Over a period of time विया वकये बगैर कमम आपोअप होता है होने का अहसास होता है|
  8. 8. भवियोग
  9. 9. भवियोग  भसि का मतलि है– ईश्वरके असस्तत्व की िवमत्र और ितत जाणीव और उिके प्रसत आत्मिमपमण करना । पंसित श्रीपद शास्त्री सकं जविेकर –  अंतर मेंप्रेम, सवचारोंमेंपसवत्रता और आचरण मेंशुद्दता जो भसि िे सनमामण होती हैवह भसि प्रत्येक मनुष्य की प्रचंि शसि है।
  10. 10. भवियोग  नारदमुसन की भसि की पररभाषा – नारदस्त तदसपमता सिला चारता । तद सवस्मरणेपरमव्या कुलतेसत ॥ ना. भ. िूत्र १९  अपने िारे आचार सवचार प्रभु को अपमण करो और जि प्रभु का सवस्मरण हो ति अत्यंत व्याकुल हो जाना यह भगवंत की परम भसि
  11. 11. भवियोग  भसि का मागम– नवधा भसि श्रवणं कीतमन सवष्णो: स्मरणं पादिेवनम । अचमनं वंदनं दास्यं िख्यामात्म सनवेदनम ॥
  12. 12.  भसि के भाव –  शांत – सभष्म  दास्य – हनुमान  िाख्य – अजमनु  वात्िल्य – यशोदा  माधुयम - राधा भवियोग
  13. 13. भवियोग  भसि योग की सवसशĶता  Simple compare to other Yog –  राजयोग मेंशरीर िौष्टव;  ज्ञानयोग मेंवैराग्य;  कममयोग मेंउत्िाह िेकाम करने की क्षमता  परन्तु भसि योग में– सनरपेक्ष सनव्यामज प्रेमभावना
  14. 14. ज्ञानयोग
  15. 15. ज्ञानयोग  मैंकौन ह ूँ।  स्थल और काल की मयामदा नहीं ऐिेशाश्वत ित्य या है, ऐिेतत्त्वज्ञान के प्रश्न कर के उिके उत्तर, सचंतन, मनन द्वारा ढूूँढना ।  इिके सलयेिाधक गुरु ग्रंथ और स्वाध्याय का आधार लेतेहै।  अंसतम फल – ब्रह्मज्ञान की प्रासि ।
  16. 16.  िमथम के मुतासिक - ज्ञानयोग एक ज्ञानाचेलक्षण । ज्ञान म्हसणजेआत्मज्ञान । पहावेआपणासि आपण । या नावे ज्ञान ॥  योग िाधना िेिुद के शुद्द स्वरूप का पररचय और आत्मशसि की पहचान मतलि के स्वरूपज्ञान या तो आत्मज्ञान की प्रासि ।
  17. 17. Different path of yog selected to achieve the eternal has same requirement and result  सनरंतर और दीर्मकाल पयमन्त िाधना  सचत्तशुसद्द  सनरंतर आसण दीर्मकाळ िाधना  ज्ञानप्रासि
  18. 18. राजयोग
  19. 19. राजयोग  पतंजसल के अĶांग योग को ही राजयोग कहते है।  पतंजसल के मुजि –  योगसित्तवसृत्तसनरोधः । प.यो.ि.ू१.२ ॥
  20. 20. राजयोग  राजयोग – िसहरंग योग िाधना ।  यम: िमाज मेंरहने के िाथ पालने के सनयम ।  सनयम: व्यसि को अपने जीवन मेंपालने के सनयम ।  आिन: शारीररक स्तर पेजो सस्थर और िुिमय है।  प्राणायम: श्विन सनयंत्रण िेमनो सनयंत्रण; प्राणशसि का अनुभव ।
  21. 21. राजयोग  राजयोग – अंतरंग िाधना  प्रत्याहार: िवम इसन्ियों को िाहर के सवषय िेअंतरंग तरफ मोड़ना |  धारणा: सचत्त को एक सवषय पर सस्थर करने का प्रयत्न |  ध्यान: धारणा के सवषय मेंलंिे िमय तक सचत्त एकाग्र रिना  िमासध: ज्ञान प्रासि ; कै वल्य प्रासि
  22. 22.  योग का प्रवाि : राजयोग स्थूल िेिूक्ष्म तक और िूक्ष्म िेअनंत की तरफ
  23. 23. जप योग
  24. 24.  अंतरंग योगसाधना की पूिम तैयारी  महत्त्ि के अंग -  वलवित  िाविक (िैिरी) - उच्िार स्थान – मुख; मध्यमा (कंठ); पश्यन्ति (हृदय); परा (नाभि)  मानवसक  उपांशु जप  अजपाजप जप योग
  25. 25.  िमथम के मुतासिक, जप योग श्वािािरोिर र्ेता िो | िोसिता अहम | ऐिेचाले| िोिहम् िोिहम् ||  कोई भी पद्दसत (method) िेकरे, अल्प िमय के सलये करे , पर िमरि हो के करे
  26. 26. मंत्र योग
  27. 27. मंत्र योग  मंत्र योग  मंत्र के द्वारा मन को अंदर की तरफ मोड़ना  शब्दप्रधान या तो ध्वसन प्रधान मंत्र  ध्वसनप्रधान मंत्र – कं पन पैदा करना –स लं, ह्रीं, etc  शब्दप्रधान – ॐ नमः सशवाय:  ध्वसन िे ज्यादा शब्द और शब्द िे ज्यादा भाव
  28. 28. हठ योग
  29. 29. हठ योग  ह – िूयम वाचक, ठ – चंि वाचक  िूयम और चंि, येदोनों जीवन के द्वन्द्व का प्रसतक है  िूयम नािी और चंि नािी, येदोनों का िंतुलन पाकर िुषुम्ना नािी को जागृत करना है  हठयोग की िाधना द्वारा येद्वन्द्व पेसनयंत्रण पाना है  योग की िाधना िेसशव और शसि का समलन  राजयोग मेंप्रगसत होती है
  30. 30. नाद योग / लय योग
  31. 31. नाद योग / लय योग  नाद िेअनुिंधान  नादयोग की िूक्ष्म ध्वसन लहेरों िे जुड़ना  अवणमनीय आनंद की अनुभूसत  मन और मज्जािंस्था पर िुिमय सवश्रांसत का अनुभव  मत्रंयोग और हठयोग द्वारा कंुिसलनी शसि जागतृहोती ह,ैउिकेशरण मेंजाना और शसि िेजड़ुना ति सचत्तवसृत्त का लय होता है– उिेलय योग कहतेह|ै  नाद एक अनाहत नाद का प्रकार और सचत्त का लय  मन शांत और सनसवमचार  िंकल्प लेने की सस्थसत का सनमामण  िाधना में प्रगसत का अहिाि
  32. 32. Summary  स्वभाव के अनुिार सवसवध योग की उपयोसगता  सियाशील व्यसि – कममयोग  िंवेदनशील व्यसि – भसियोग  िंयमशील व्यसि – राजयोग  सचंतनशील व्यसि – ज्ञानयोग
  33. 33. || हरी ॐ ||

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